आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ | Aditya Hridaya Stotra PDF in Hindi

क्या आप जीवन की कठिन परिस्थितियों में विजय प्राप्त करना चाहते है? तो हर रविवार आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इस पाठ के संपूर्ण लिरिक्स यहाँ लिखित और PDF File में दर्शाये है।

आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ | Aditya Hridaya Stotra PDF in Hindi

आदित्य हृदय स्त्रोत भगवान सूर्य देव की एक विशेष प्रार्थना है, जिसे वाल्मीकि रामायण युद्धकांड से लिया गया है। श्री राम को रावण के सामने विजय प्राप्त कराने के लिए ऋषि अगस्त्य ने इस स्तोत्र का उपयोग करने के लिए कहा था।

विशेष लाभ : इस स्तोत्र का पाठ करने पर सूर्य देव प्रसन्न होते है और हमें अधिकांश क्षेत्र में विजय की प्राप्ति करवाते है।

Aditya Hridaya Stotra PDF (आदित्य हृदय स्तोत्र)

Aditya Hridaya Stotra PDF

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यहाँ सर्वप्रथम आदित्य हृदय स्तोत्र की PDF Download लिंक दी है। जिसमे संपूर्ण स्तोत्र अर्थ सहित है और पूजा विधि करने की जानकारी भी बताई है।

PDF Name Aditya Hridaya Stotra
Total Pages 17
PDF Size 654 KB
File Maker InstaPDF
Location Google Drive
Provider Sabsastaa

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आदित्य हृदय स्तोत्र लिरिक्स (Aditya Hridaya Stotra Lyrics)

यदि पीडीएफ डाउनलोड नहीं करना चाहते और आदित्य हृदय स्तोत्र को लिखित में पढ़ना है। तो यहाँ संपूर्ण स्तोत्र के लिरिक्स हिंदी अनुवाद अर्थ के साथ पढ़ सकते है।

।। मुख्य विनियोग ।।

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा
देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः ।।

।। ध्यानम् संस्कृत में ।।

नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे,
जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे,
विरिञ्चि नारायण शङ्करात्मने।।

।। अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम ।।

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥5॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽकों शुमान् ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥
धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान् ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

॥ आदित्य हृदय स्तोत्र अर्थ सहित ॥

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ 1

अर्थात : युद्ध से थक कर श्री रामचन्द्रजी रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी उनके साथ युद्ध करने की तैयारी में था।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ 2

अर्थात : यह देखकर भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने आए थे, श्रीराम के पास गए और उनसे कहा।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ 3

अर्थात : सबके दिलों में रमन करने वाले भगवान राम, इस अनूठी पवित्र स्तोत्र को सुनो। इसका जप करने से तुम युद्ध में अपने सभी शत्रुओं को हराओगे।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ 4

अर्थात : इस विशिष्ट स्तोत्र का नाम है “आदित्यहृदय”। यह सबसे पवित्र और पूरे शत्रुओं को मार डाले ऐसा है। इसके जप से सदा जीत मिलती है। यह स्तोत्र हर समय रहता है, और परम कल्याणकारी है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ 5

अर्थात : इसमें सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है, इससे सभी पापों का नाश हो जाता है। यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ 6

अर्थात : सूर्य देव अपने अनंत प्रकाश से सुशोभित हैं। ये सदा उदय होते हैं, देवताओं और असुरों से नमस्कार प्राप्त करते हैं। विवस्वान नाम से प्रसिद्ध हैं, प्रकाश फैलाते हैं और दुनिया के मालिक हैं। तुम इनका पूजन रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः और भुवनेश्वराये नमः करो।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ 7

अर्थात : संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं, ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ 8

अर्थात : भगवान सूर्य देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, महेंद्र, कुबेर, काल, यम, सोम एवं वरुण आदि में भी प्रचलित हैं।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ 9

अर्थात : यही देवता ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ 10

अर्थात : इनके नाम हैं आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को बनाने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग, पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्मांड की उत्पत्ति का बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले)।

हरिदश्वः सहस्रार्चि: सप्तसप्ति-मरीचिमान।
तिमिरोन्मन्थन: शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान॥ 11

अर्थात : हरिदश्व, सहस्रार्चि (हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले), मरीचिमान (किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन (अन्धकार को मिटाने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक (ब्रह्माण्ड को जीवन देने वाले), अंशुमान।

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोsदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशान:॥ 12

अर्थात : हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले) हो।

व्योम नाथस्तमोभेदी ऋग्य जुस्सामपारगः।
धनवृष्टिरपाम मित्रो विंध्यवीथिप्लवंगम:॥ 13

अर्थात : व्योमनाथ (आकाश का स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले) देव।

आतपी मंडली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भव:॥ 14

अर्थात : आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल (भूरे रंग का), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति का कारण) हो।

नक्षत्रग्रहताराणा-मधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तुते॥ 15

अर्थात : नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले) और द्वादशात्मा हैं, जो तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रए नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ 16

अर्थात : आपको पूर्वगिरी उदयाचल और पश्चिमगिरी अस्ताचल से नमस्कार। आप दिन के अधिपति और ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी हैं।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाए नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ 17

अर्थात : आप जीत, सफलता और कल्याण के दाता हैं। हरे रंग के घोड़े आपके रथ में जुते रहते हैं। आपको बार-बार धन्यवाद, सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको कही बार प्रणाम करते है। नमस्कार, आप आदित्य के पुत्र हैं, अदिति।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥ 18

अर्थात : उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है।

ब्रह्मेशानाच्युतेषाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ 19

अर्थात : सूर्य देव आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं। सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषाम् पतये नमः॥ 20

अर्थात : आप अज्ञानता और अन्धकार को मार डालने वाले हैं, जड़ता और शीत को दूर करने वाले हैं और शत्रु को मार डालने वाले हैं। आप  कृतघ्नों का नाश करने वाले देवस्वरूप, आपको नमस्कार है।

तप्तचामिकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोsभिनिघ्नाये रुचये लोकसाक्षिणे॥ 21

अर्थात : आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं। देव आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है।

नाशयत्येष वै भूतम तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ 22

अर्थात : रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सभी भूतों को मार डालते हैं, बनाते हैं और पालन करते हैं। ये अपनी किरणों से गर्मी देते हैं और बारिश करते हैं।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रम् च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम॥ 23

अर्थात : ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले मूल फल हैं।

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनाम फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ 24

अर्थात : वेद और यज्ञों के फल भी ये ही हैं, संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में पूर्ण समर्थ हैं।

एन मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव॥ 25

अर्थात : राघव! जो कोई इन सूर्यदेवों का गायन करता है जब वह विपत्ति, कष्ट, कठिन मार्ग या किसी अन्य भयानक परिस्थिति में, उसे कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

पूज्यस्वैन-मेकाग्रे देवदेवम जगत्पतिम।
एतत त्रिगुणितम् जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ 26

अर्थात : इसलिए आप एकांत में बैठकर इन सूर्य देव की पूजा करें। तीन बार इस आदित्यहृदय का जप करने से युद्ध में विजय मिलेगी।

अस्मिन क्षणे महाबाहो रावणम् तवं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदाsगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ 27

अर्थात : महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोsभवत्तदा।
धारयामास सुप्रितो राघवः प्रयतात्मवान ॥ 28

अर्थात : महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने उनका उपदेश सुनकर शोक त्याग दिया। प्रसन्न होकर उन्होंने शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय धारण किया।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परम हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान॥ 29

अर्थात : और भगवान् सूर्य को तीन बार आचमन करके शुद्ध करके तीन बार जप किया। इससे उन्हें बहुत खुशी हुई। फिर साहसी रघुनाथ ने अपना धनुष उठाया।

रावणम प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोsभवत्॥ 30

अर्थात : रावण को देखकर वे उत्साहित होकर आगे बढ़े। पूरी कोशिश करके उन्होंने रावण को मार डालना तय किया।

अथ रवि-रवद-न्निरिक्ष्य रामम। मुदितमनाः परमम् प्रहृष्यमाण:।
निशिचरपति-संक्षयम् विदित्वा सुरगण-मध्यगतो वचस्त्वरेति॥ 31

अर्थात : उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और रावण के विनाश का समय निकट होते देखकर उत्साहित होकर कहा, “रघुनन्दन! अब जल्दी करो।” भगवान् सूर्य की प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में बताया गया यह आदित्य हृदयम मंत्र इस प्रकार संपन्न होता है।

आदित्य हृदय स्तोत्र पूजा विधि नियम

आपको पुरे ध्यान के साथ पूजा विधि कुछ इस प्रकार करनी है।

  • सबसे पहले सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके पवित्र हों जाये।
  • फिर किसी शुद्ध स्थान पर पूजा के लिए आसन बिछाएं।
  • आगे साफ कपड़े पहन कर आसन पर बैठ जाएं।
  • फिर सर्वप्रथम भगवान सूर्य की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
  • अब भगवान सूर्य को अक्षता, पुष्प, धूप, दीप आदि से पूजा करें।
  • इसके बाद आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना शुरू करे।
  • पाठ के बीच में अगरबत्ती और फूल अर्पित करते रहें।
  • पूजा के अंत में भगवान सूर्य की आरती करके प्रसाद चढ़ाएं।
  • फिर प्रसाद का भोग लगाकर पूजा समाप्त करें।
  • याद रहे इस विशेष पूजा के दिन मांस, मदिरा और तेल से दूर रहना है।

इस प्रकार आदित्य हृदय स्तोत्र की पूजा विधि को पूरा करने से भगवान सूर्य की कृपा प्राप्त होती है।

आशा करता हु आदित्य हृदय स्तोत्र सम्बंधित अच्छी जानकारी दे पाया हु। मिलते है अपनी नेक्स्ट पोस्ट में तब तक टेक केयर।

Karanveer
Karanveer

में करनवीर पिछले 8 साल से Content Writing के कार्य द्वारा जुड़ा हूँ। मुझे ऑनलाइन शॉपिंग, प्रोडक्ट रिव्यु और प्राइस लिस्ट की जानकारी लिखना अच्छा लगता है।

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