251+ संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas With Meaning In Hindi

251+ संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi

आप पढ़ रहे है इंटरनेट पर उपलब्ध संस्कृत श्लोक का सबसे बड़ा और बेहतरीन संग्रह। जिसमे 251 से ज्यादा Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi को अर्थ सहित समझाया है।

251+ संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi

हमारे भारत में आज तक लाखो संस्कृत श्लोक की रचना हो चुकी है। जिसमे निम्नलिखित महान लोगो के श्लोक सबसे ज्यादा मशहूर है

  • श्री कृष्णा के श्लोक
  • भगवान राम के श्लोक
  • महादेव शिव के श्लोक
  • श्री गणेश जी के श्लोक
  • गुरु चाणकय के श्लोक

हमने इस पोस्ट में इन सभी मुख्य श्लोक को समाविष्ट करने की कोशिश की है। साथ ही विभिन्न रचना एंव पुस्तक से भी कुछ जरुरी श्लोको को अर्थ के साथ बताया है।

ध्यान दीजिये : यह श्लोक आपको जीवन के हर छोटे-बड़े क्षेत्र को समझने में काम आएंगे। तो श्री गणेश का नाम लेकर करते है श्लोक लिस्ट की शुरुआत।

251+ Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi

आगे बताई लिस्ट में मुख्य 3 श्रेणी आधारित बेहतरीन संस्कृत श्लोक दर्शाये है।

  • ग्रंथ आधारित श्लोक
  • प्रभु द्वारा बताये श्लोक
  • जीवन के विशेष श्लोक

ग्रंथ यानी भगवद गीता और रामायण जैसे महान पुस्तक के श्लोक। प्रभु में श्री कृष्णा, महादेव, श्री राम द्वारा कहे विशेष श्लोक है। फिर जीवन में जरुरी एंव उपयोगी श्लोको के बारे में बताया है।

नोट : सरलता के लिए यहाँ 25 हैडिंग बनाये है और प्रत्येक हैडिंग में आप 10 श्लोक पढ़ सकते है।

(1) Best Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

Best Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थात : सभी सुखी रहो, सभी रोगों से मुक्त रहें, सभी के लिए मंगल जीवन हो, किसी को भी दुःख या कष्ट न मिले।

सुखं भवतु लोकाः सर्व प्रजाः सन्तु निरामयाः।
धर्मेण वर्धतां लोको विद्याभिवृद्धिमाप्नुयात्॥

अर्थात : श्लोक अनुसार सारी दुनिया सुखी रहे, सभी लोग स्वस्थ रहें। धर्म से समाज उन्नति करे और लोगो में ज्ञान की वृद्धि होती रहे।

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।

अर्थात : आलस्य मानव का सबसे बड़ा दुश्मन है। श्रम मानव का सबसे अच्छा मित्र है क्योंकि वह हमेशा उसके साथ रहता है, इसलिए वह दुखी नहीं होता।

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थात : तेरा मेरा करने वाले लोगों की सोच उन्हें छोटा बना देती है, जबकि जो लोग सभी का हित चाहते हैं। वे पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं।

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

अर्थात : जिसकी जड़ें ऊपर की तरफ जाती हैं, शाखाएँ नीचे की ओर, और जो कभी नष्ट नहीं होता। ऐसे अश्वत्थ वृक्ष के पत्तों को वेद माना गया है। जो इसे जानता है, वही सच्चा विद्वान कहलाता है।

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम् ॥

अर्थात : जो आलस में रहते हैं उन्हें विद्या प्राप्त नहीं होती, जिनके पास विद्या नहीं होती वो धन नहीं कमा पाते। जो निर्धन हैं उनके मित्र नहीं बन पाते और मित्र के बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो पाती।

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थात : यह मेरा और वह पराया, ऐसा सोचना कमजोर विचारधारा वालों की निशानी है। उदार हृदय वालों के लिए तो सारा संसार ही एक परिवार समान है।

बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः ।
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः ॥

अर्थात : यदि कोई कर्मठ नहीं है और अपना धर्म नहीं निभाता है, तो वह शक्तिशाली होते हुए भी निर्बल होता है, धनी होते हुए भी गरीब होता है और पढ़े लिखे होते हुए भी अज्ञानी होता है।

एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
अग्निं यथैकं सहस्रधा विभाति विश्वं तथैकम् ॥

अर्थात : एक सत्य को ऋषि ग्यानी अनेक रूपों में वर्णित करते हैं। जैसे एक अग्नि हज़ारों रूप धारण कर के विश्व को प्रकाशित करती है।

चन्दनं शीतलं लोके, चन्दनादपि चन्द्रमाः ।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ॥

अर्थात : चन्दन को दुनिया में सबसे शीतल लेप कहा जाता है, लेकिन कहते हैं कि चंद्रमा उससे भी ज्यादा शीतलता देती है। किसी अच्छे दोस्त का साथ चन्दन से अधिक शांति और शीतलता देता है।

(2) Good Morning Sanskrit Shlok With Hindi

Good Morning Sanskrit Shlok With Hindi

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती ।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम् ॥

अर्थात : सुबह के समय हाथों का दर्शन करने से हथेली में श्री लक्ष्मी विराजमान रहती हैं। अँगूठे और तर्जनी में माँ सरस्वती तथा कलाई में ब्रह्मा जी का वास होता है।

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
कालः करोति व्यतीतं घटिकामिव मानद ॥

अर्थात : हे मित्र! उठिए, जागिए और मनचाहा लाभ प्राप्त कीजिए क्योंकि समय घड़ी की तरह बीतता जा रहा है। इस रोकना असंभव है, इसलिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए चलो।

ऊर्ध्वमूलं तिलकं शाखा ततो रूपायनं परम् ।
प्रभाते पद्मनाभस्य ध्यानं करोमि सदा ॥

अर्थात : मैं रोज प्रातकाल में लोटाकार जड़ वाले, ऊपर की ओर फैली हुई शाखाओं वाले और सुंदर रूप धारण किए भगवान विष्णु का ध्यान करता हूँ।

उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरासन्न धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥

अर्थात : उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ो। कठिन परिश्रम और निश्चित रूप से कठोर मार्ग को पार किया जा सकता है।

अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च।
पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

अर्थात : दुनिया के हर मनुष्य को आठ गुण सुशोभित करते है। जिसमे बुद्धि, अच्छा चरित्र, आत्म-संयम, शास्त्रों का अध्ययन, वीरता, कम बोलना, क्षमता और दान शामिल है।

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अर्थात : अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए की आँखें ज्ञान के प्रकाश से उज्जवल करने वाले गुरु को नमन है। यह बात शिष्य द्वारा गुरु को कही जाती है।

आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥

अर्थात : विश्व के सभी महंगे रत्नों से महंगा हमारा जीवन है, जो एक बार इसे खोया वापस नहीं ला सकते। इसलिए इसे बेकार कामों में खर्च करना बहुत बुरा निर्णय है।

प्रातःकालस्य शुभस्य विभूतिर्मम चक्षुषः।
सम्पद्यतां मनोरथः प्रभाते हि विनियोगतः॥

अर्थात : हे प्रभु, प्रभात काल की शोभा मेरी आँखों को प्रफुल्लित करे। साथ ही मेरी इच्छाएँ पूर्ण हों क्योंकि प्रभात में प्रार्थना करने से सफलता अवश्य मिलती है।

भास्करस्य रश्मयः प्रभाते विमला दृश्यन्ते।
तासां दर्शनमात्रेण जन्मजन्मान्तरक्लमा॥

अर्थात : प्रभात में सूर्य की किरणें साफ़ निर्मल दिखाई देती हैं। उनका दर्शन मात्र ही जन्म-जन्मान्तर के क्लेशों को दूर करने की क्षमता रखता है।

न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥

अर्थात : सच में किसी को नहीं पता कि कल क्या होने वाला है। इसलिए जो भी काम करना है, आज और अभी में करना चाहिए। यही बुद्धिमान व्यक्ति की निशानी होती है।

(3) Sanskrit Shlok From Bhagavad Geeta

Sanskrit Shlok From Bhagavad Geeta

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थात : श्री कृष्ण अनुसार केवल कर्म करना ही हमारे हाथ में है। कर्म द्वारा मिलने वाले फल हमारे हाथ में नहीं है। इसलिए निस्वार्थ हो कर सिर्फ अच्छे कर्म करने पर ही ध्यान देना चाहिए।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थात : जब धर्म खतरे में आता है उस पर हानि पहुँचती है और अधर्म की वृद्धि होने लगती है। तब श्री कृष्ण अपने महा स्वरुप की रचना द्वारा आगे आते है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

अर्थात : कोई भी मनुष्य किसी भी काल में थोड़े वक़्त के लिए भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। क्यों की प्रकृति की रचना अनुसार प्रत्येक मनुष्य हर क्षण में कर्म करने के लिए बाध्य होता है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

अर्थात : विषयों वस्तुओं के बारे में सोचते रहने से मनुष्य उनके प्रति आसक्ति विकसित करता है। इससे उनमें कामना, यानी इच्छा पैदा होती है, और कामनाओं को रोका जाता है तो क्रोध आता है।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥

अर्थात : श्रीमद भगवत गीता अनुसार आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता, नाही किसी प्रकार की आग उसे जला सकती है। कोई पानी, हवा या आपत्ति भी आत्मा को मार नहीं सकती।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य: ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥

अर्थात : श्री कृष्णा कहते है जिस मनुष्य द्वारा किसी को कष्ट नहीं पहुँचता, नाही कोई नुकसान होता है। जो सुख-दुख तथा भय चिंता में भी समभाव रहता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यंत प्रिय है।

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥

अर्थात : मैं शरीर नहीं हूं, न ही मेरा शरीर है, बल्कि मैं एक धारणा हूं। मुक्ति प्राप्त करने के बाद उसे याद नहीं रहता कि उसने क्या किया था।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

अर्थात : जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं। जो प्राणियों के हित में सोचता हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को पाते हैं।

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

अर्थात : जब एक परिवार नष्ट हो जाता है तो परिवार के सनातन रीति-रिवाज नष्ट हो जाते हैं। जब धार्मिक सिद्धांत नष्ट हो जाते हैं, तो अधर्म पूरे परिवार पर हावी हो जाता है।

न चोरहार्यं न च राजहार्यंन भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

अर्थात : विद्यारूपी धन कोई चोर चुरा नहीं सकता था, न कोई राजा भी। न कोई भाई उस पर साझीदार बन सकता था, न ही वह बोझ बन सकता था। ज्ञान का धन, जो सभी धनों में प्रमुख है, खर्च करने पर सदैव बढ़ता रहता है।

(4) Valmiki Ramayana Shlokas With Meaning

Valmiki Ramayana Shlokas With Meaning

धर्म-धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् ।
धर्मण लभते सर्वं धर्मप्रसारमिदं जगत् ॥

अर्थात : श्लोक कहना चाहता है की धर्म से धन और धर्म से सुख मिलता है। धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करके मनुष्य इस संसार में सब कुछ धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्राप्त कर सकता है।

सत्य -सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।
सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥

अर्थात : सत्य ही संसार में ईश्वर समान है, धर्म भी सत्य के ही आश्रित रहता है। सत्य ही समस्त भव-विभव का मूल है, इस जगत में सत्य से बढ़कर अन्य कुछ नहीं है।

उत्साह-उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् ।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम् ॥

अर्थात : रामायण ज्ञान अनुसार उत्साह बड़ा बलवान होता है, उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता।

कर्मफल-यदाचरित कल्याणि ! शुभं वा यदि वाऽशुभम् ।
तदेव लभते भद्रे! कर्त्ता कर्मजमात्मनः ॥

अर्थात : मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्त्ता या व्यक्ति को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है।

सुदुखं शयितः पूर्वं प्राप्येदं सुखमुत्तमम् ।
प्राप्तकालं न जानीते विश्वामित्रो यथा मुनिः ॥

अर्थात : विश्वामित्र मुनि ने कहा कि किसी को बहुत दिनों तक कठोर दुःख भोगने के बाद बड़ा सुख मिलता है। तो उसे समय का ज्ञान नहीं रहता, सुख का अधिक समय भी आगे कम महसूस सकता है।

स तु रामः प्रियं वाक्यमुच्चैर्भ्रातरमब्रवीत्।
अर्थानां मूलमुत्तमं त्यागो धर्म उच्यते॥

अर्थात : एक घटना में तब श्रीराम जी ने प्यारे शब्दों में अपने भाई लक्ष्मण से कहा – हे भाई! त्याग को धर्म का मूल माना गया है। तो हमें त्याग में कोई दुःख नहीं करना चाहिए।

क्रोध – वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित् ।
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित् ॥

अर्थात : क्रोध की दशा में मनुष्य को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं रहता। क्रुद्ध मनुष्य कुछ भी कह सकता है और कुछ भी बक सकता है। उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं रहता है।

अपना-पराया-गुणगान् व परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा ।
निर्गणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः ॥

अर्थात : पराया मनुष्य भले ही गुणवान् हो तथा स्वजन सर्वथा गुणहीन ही क्यों न हो। लेकिन गुणी परजन से गुणहीन स्वजन ही भला होता है, क्यों की वो अपना है और पराया बदल सकता है।

न सुहृद्यो विपन्नार्था दिनमभ्युपपद्यते ।
स बन्धुर्योअपनीतेषु सहाय्यायोपकल्पते ॥

अर्थात : सुह्रद् वही है जो विपत्तिग्रस्त दीन मित्र का साथ दे और सच्चा बन्धु वही है, जो अपने बुरे रास्ते पर चलने वाले मित्र की भी सहायता करे।

आढ् यतो वापि दरिद्रो वा दुःखित सुखितोऽपिवा ।
निर्दोषश्च सदोषश्च व्यस्यः परमा गतिः ॥

अर्थात : चाहे आप धनी हो या निर्धन, दुःखी हो या सुखी। आप निर्दोष हो या सदोष, मित्र ही मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा होता है।

(5) Mahadev Shiv Ke Sanskrit Shlok

Mahadev Shiv Ke Sanskrit Shlok

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्,
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

अर्थात : हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। जिस प्रकार उर्वशी ने अमृत से मुक्ति पायी, उसी प्रकार मुझे भी मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दीजिये।

पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय।
भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय।।

अर्थात : जो स्वच्छ पद्मरागमणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले हैं, चन्दन तथा अगरू से चर्चित तथा भस्म, जूही से सुशोभित और प्रफुल्लित कमल ऐसे नीलकमलसदृश कण्ठवाले महादेव शिव को प्रणाम।

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि।।

अर्थात : जिसकी सेवा डायनों के समाज में तथा मांस खाने वालों द्वारा भी की जाती है। मैं उन भगवान शिव को प्रणाम करता हूं जो अपने भक्तों के कल्याण के लिए सदैव भीम आदि नामों से जाने जाते हैं।

नमस्ते भगवान रुद्र भास्करामित तेजसे।
नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने।।

अर्थात : हे मेरे भगवान! हे मेरे रूद्र, अनंत सूर्यो से भी तेज आपका तेज है। रसरूप, जलमय विग्रहवाले हे! भवदेव शिव मेरा आपको प्रणाम है।

दृशं विदधमि क करोम्यनुतिशमि कथं भयाकुल:।
नु तिश्सि रक्ष रक्ष मामयि शम्भो शरणागतोस्मि ते।।

अर्थात : हे भोले शंभु, मैं अब दृष्टि लगाऊं, क्रिध्र देखूं, भयभीत में कैसे यहां रहूँ? मेरे प्रभु आप कहा पर है? आप मेरी रक्षा करों मैं आपकी शरण में आया हूँ।

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

अर्थात : जो भगवान शिव शंकर संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार धारण किए हैं। अकाल मृत्यु से बचने के लिए उन देवों के भी देव महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

सदुपायकथास्वपण्डितो हृदये दु:खशरेण खण्डित:।
शशिखण्डमण्डनं शरणं यामि शरण्यमीरम्।

अर्थात : हे भोलेनाथ! मेरा हृदय दु:ख रूपी बाण से पीडित है और मैं इस दु:ख को दूर करने वाले किसी उपाय को नहीं जानता हूँ। अतएव चन्द्रकला व शिखण्ड मयूरपिच्छ का आभूषण बनाने वाले, शरणागत के रक्षक परमेश्वर आपकी शरण में हूँ। अर्थात् आप ही मुझे इस भयंकर संसार के दु:ख से दूर करें।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं। मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरं।।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।

अर्थात : जो हिमाचल की तरह गंभीर और गौरवर्ण हैं। जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों का प्रकाश और सौंदर्य है। जिनके सिर पर सुंदर गंगा नदी है। जिनके गले में सर्प और ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा है।

देवगणार्चितसेवितलिंगम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्।।

अर्थात : मैं प्रभु सदाशिव के उस लिंग को प्रणाम करता हूं। जो लिंग देवगणों से पूजित तथा भावना और भक्ति से सेवित है और जिस लिंग की प्रभा-कान्ति या चमक करोड़ों सूर्यों की तरह है।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यं।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

अर्थात : मैं योग, जप और पूजा नहीं जानता। हे शम्भो, मैं आपको हर समय नमस्कार करता हूँ। हे भगवान, मुझे बुढ़ापे और जन्म के दुःखों से बचाओ। नमस्कार, हे शम्भो महादेव!

(6) Best Aacharya Chanakya Neeti Shlokas

Best Aacharya Chanakya Neeti Shlokas

नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः ॥

अर्थात : अपने व्यवहार में किसी व्यक्ति को बहुत भोलापन या सीधापन नहीं दिखाना चाहिए। याद रखें कि वन में सबसे पहले सीधे पेड़ काटे जाते हैं, और टेढ़े पेड़ खड़े रहते हैं।

कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥

अर्थात : भविष्य में आप सही काम करेंगे अगर आप सही समय, सही दोस्त, सही जगह, पैसे कमाने के सही साधन, पैसे खर्च करने के सही तरीके और अपने ऊर्जा स्रोत पर ध्यान देंगे।

जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् बान्धवान्व्यसनाऽऽगमे।
मित्रं याऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

अर्थात : किसी विशेष कार्य द्वारा सेवक की पहचान होती है। दुःख के समय बन्धु-बान्धवों की, विपत्ति के समय मित्र की तथा धन नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है।

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥

अर्थात : जब कोई व्यक्ति स्पष्ट सही को छोड़कर अस्पष्ट गलत का सहारा लेता है, तो उसका सही भी नष्ट हो जाता है। इसलिए सही और गलत की परख हर समय करें।

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥

अर्थात : आचार्य चाणक्य अनुसार जिस देश में न इज्जत है, न रोजी-रोटी है, न रिश्तेदार हैं। वहां ज्ञान तक पहुंच नहीं है और किसी को वहां नहीं रहना चाहिए।

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥

अर्थात : हम इतना गंभीर सागर मानते हैं, लेकिन प्रलय आने पर वह भी अपनी सीमा भूल जाता है। और किनारों को तोड़कर जल-थल को एक कर देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी साधु या श्रेष्ठ व्यक्ति श्रेष्ठ मूल्यों का उल्लंघन नहीं करता।

गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः।
प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥

अर्थात : जब मनुष्य के अच्छे गुण होते हैं, तो वह सर्वश्रेष्ठ या उत्तम बनता है। पद के आधार पर किसी को सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। यह महल के शिखर पर बैठकर कौआ को गरुड नहीं बनाने की तरह है।

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥

अर्थात : धन को विपत्ति के समय सुरक्षित रखना चाहिए। धन से अधिक पत्नी की सुरक्षा करनी चाहिए। साथ ही, अपनी सुरक्षा का अवसर आने पर अपनी पत्नी और धन को भी त्याग देना चाहिए।

कामधेनुगुना विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

अर्थात : विद्या प्राप्त करना एक कामधेनु के समान है जो हर समय अमृत देता है। वह विदेश में माता की तरह मदद करती है और बचाती है। यही कारण है कि विद्या को गुप्त धन कहा जाता है।

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसण्कटे।
राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः ॥

अर्थात : चाणक्य नीति अनुसार सच्चा मित्र बीमार होने पर, असमय शत्रु से घिरने पर, राजकार्य में सहायक होने पर तथा मरने पर श्मशान में ले जाने वाला है।

(7) Motivational Sanskrit Shlok In Hindi

Motivational Sanskrit Shlok In Hindi

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाऽमृतमश्नुते।।

अर्थात : जो भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान दोनों जानते हैं, मन और आत्मा की पवित्रता से और मृत्यु का भय से मुक्ति मिलती है, जो शारीरिक और मानसिक प्रयासों से होता है।

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥

अर्थात : सिंह को जंगल का राजा बनाने का कोई अभिषेक या उत्सव नहीं है। वह अपने गुणों और पराक्रम से खुद मृगेंद्रपद पाता है।

निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते।।

अर्थात : वह बुद्धिमान है जो अपनी कोशिशों पर दृढ़ प्रतिबद्धता से शुरू करता है, काम पूरा होने तक ज्यादा आराम नहीं करता, समय बर्बाद नहीं करता और अपने विचारों पर नियंत्रण रखता है।

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः ।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥

अर्थात : सच्चा ज्ञानी वही है जो सरदी-गरमी, अमीरी-गरीबी, प्रेम-धृणा इत्यादि विषय परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता और तटस्थ भाव से अपना राजधर्म निभाता है।

हस्तस्य भूषणम दानम, सत्यं कंठस्य भूषणं।
श्रोतस्य भूषणं शास्त्रम,भूषनै:किं प्रयोजनम।।

अर्थात : हाथ का आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य है। कान की शोभा शास्त्र सुनने से है, फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है।

शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम्।
शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतनि शनैः शनैः॥

अर्थात : राह धीरे धीरे कटती है, कपड़ा धीरे धीरे बुनता है, पर्वत धीरे धीरे चढा जाता है। विद्या और धन भी धीरे-धीरे प्राप्त होते हैं, सही अर्थ में ये पाँचों धीरे धीरे ही होते हैं।

यद्यत्संद्दश्यते लोके सर्वं तत्कर्मसम्भवम्।
सर्वां कर्मांनुसारेण जन्तुर्भोगान्भुनक्ति वै।।

अर्थात : कर्म लोगों में सुख या दुःख को जन्म देता है। उसने जो कुछ किया था, उसके अनुसार हर प्राणी खुश होता है या दुखी होता है।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा॥

अर्थात : योगाभ्यास द्वारा सभी भौतिक क्लेशों को दूर कर सकते हैं जो खाने, सोने, मनोरंजन करने और काम करने की आदतों में नियमित रहता है।

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि।
एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते।।

अर्थात : दया के बिना किए गए काम को कोई लाभ नहीं मिलता, और ऐसे काम में धर्म नहीं होता जहां दया नहीं होती। इस तरह यहाँ वेद भी अवेद बन जाते हैं।

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥

अर्थात : विद्वान व्यक्ति भी मूर्ख शिष्य को पढ़ाने, बुरी स्त्री के साथ रहने और बीमार लोगों के साथ रहने पर दुखी होता है।

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्।।

अर्थात : जब तक काम पूरा नहीं होता, लोग दूसरों की प्रशंसा करते रहते हैं। काम पूरा होने पर दूसरे को भूल जाते हैं। जैसे नदी पार करने के बाद नाव भी बेकार हो जाती है।

(8) One Line Short Sanskrit Shlokas

One Line Short Sanskrit Shlokas

  • वसुधैव कुटुम्बकम् – सारा संसार ही एक परिवार है।
  • अहिंसा परमो धर्म – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है।
  • सत्यमेव जयते नानृतं – केवल सत्य विजय पाता है, असत्य नहीं।
  • धर्मो रक्षति रक्षित – धर्म उसकी रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है।
  • ज्ञानं परमं धनम् – ज्ञान सबसे बड़ा धन है।
  • मा कृधाः काश्चन – किसी से भी कभी ईर्ष्या मत करो।
  • उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान् – उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त करो।
  • सुखं भवतु लोका – सारी दुनिया सुखी रहे।
  • धर्मो रक्षति रक्षकम् – धर्म अपने रक्षक की रक्षा करता है।
  • परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् – दूसरों की सहायता करना पुण्य और पीड़ित करना पाप है।
  • अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया – अज्ञान के अंधकार को ज्ञान की ज्योत से दूर किया जा सकता है।
  • एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति – सत्य तो एक है, पर ऋषि लोग उसे अनेक रूपों में कहते हैं।

(9) सर्वश्रेष्ठ श्लोक संग्रह – Sanskrit Shlokas Meaning

Sanskrit Shlokas Meaning

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

अर्थात : जिस व्यक्ति के पास स्वयं का विवेक या सदगुण नहीं है। शास्त्र उसका क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ होता है।

अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः पापैः सन्धि परदाराभिमर्शम् ।
दम्भं स्तैन्य पैशुन्यं मद्यपानं न सेवते यश्च सुखी सदैव ॥

अर्थात : जो व्यक्ति घर से अकारण बाहर नहीं रहता, बुरे लोगों से बचता है और किसी परस्त्री से संबंध नहीं रखता। वह चोरी, चुगली, पाखंड और मद्यपान नहीं करता तो हर समय खुश रहता है।

अपि मेरुसमं प्राज्ञमपि शुरमपि स्थिरम्।
तृणीकरोति तृष्णैका निमेषेण नरोत्तमम्।।

अर्थात : भले ही कोई व्यक्ति मेरु पर्वत की तरह स्थिर क्यों न हो। चतुर, बहादुर दिमाग का हो तो भी लालच उसे पल भर में घास की तरह खत्म कर सकती है।

न संरम्भेणारभते त्रिवर्गमाकारितः शंसति तत्त्वमेव ।
न मित्रार्थरोचयते विवादं नापुजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥

अर्थात : जो धर्म, अर्थ और काम को जल्दबाजी में नहीं शुरू करता, पूछने पर सत्य ही बताता है। दोस्त के कहने पर बहस से बचता है और अनादर होने पर भी दुखी नहीं होता। वह वास्तव या सही मायने में ज्ञानी कहलाता है।

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन:।।

अर्थात : हे मनुष्य सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना। साथ ही प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति ।
न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥

अर्थात : उस व्यक्ति को संसार में श्रेष्ठ कहा जाता है जो ठंडी पड़ी दुश्मनी को फिर से नहीं भड़काता, अहंकाररहित रहता है, तुच्छ व्यवहार नहीं करता, मुसीबत में होकर अनुचित कार्य नहीं करता।

न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।
व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

अर्थात : श्लोक अनुसार न कोई किसी का मित्र होता है, न कोई किसी का शत्रु। संपूर्ण व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं।

देशाचारान् समयाञ्चातिधर्मान् बुभूषते यः स परावरज्ञः ।
स यत्र तत्राभिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥

अर्थात : जिस व्यक्ति को लोक व्यवहार, लोकाचार, समाज में व्याप्त जातियों और धर्मों का ज्ञान होता है, वह ऊँच-नीच का ज्ञान प्राप्त करता है। वह जहाँ भी जाता है, अपने प्रभाव से लोगों को नियंत्रित करता है।

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम्।।

अर्थात : निम्न कोटि के लोग केवल धन चाहते हैं। मध्यमवर्गीय व्यक्ति धन और सम्मान चाहता है। वहीं, एक उच्च कोटि का व्यक्ति केवल सम्मान चाहता है। सम्मान की तुलना में कुछ भी अधिक मूल्यवान नहीं है।

समैर्विवाहः कुरुते न हीनैः समैः सख्यं व्यवहारं कथां च ।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः॥

अर्थात : नीतिवान व्यक्ति अपनी बराबरी के लोगों के साथ विवाह करता है, उनसे मित्रता करता है, उनसे व्यवहार करता है और उनके गुणगान करता है। वह श्रेष्ठम नीतिवान वाला व्यक्ति कहलाता है।

(10) Best Slokas In Sanskrit – हिंदी अनुवाद सहित

Best Slokas In Sanskrit

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

अर्थात : विद्या मनुष्य को विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता प्राप्ति से योग्यता आती है। योग्यता द्वारा हमें धन की प्राप्ति होती है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है तो अवश्य सुखी रहते है।

अर्थम् महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा।
विचरत्यसमुन्नद्धो य: स पंडित उच्यते ॥

अर्थात : यह बेहतरीन संस्कृत श्लोक है, जिसका मतलब होता है। जो व्यक्ति ज्यादा धन-संपत्ति, ज्ञान, प्रसिद्धि को पाकर भी अहंकार नहीं करता, वह सच्चा ज्ञानी कहलाता है ।

शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः।
वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा।।

अर्थात : सौ लोगों में से एक शूरवीर होता है, हजार लोगों में एक विद्वान होता है। दस हजार लोगों में एक अच्छा वक्ता होता है, वही लाखों में बस एक ही दानी होता है।

एकः सम्पत्रमश्नाति वस्त्रे वासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥

अर्थात : उससे बढ़कर क्रूर व्यक्ति कौन होगा जो स्वार्थी है, स्वयं कीमती वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन, सुख-ऐश्वर्य की वस्तुओं का उपभोग करता है और उन्हें गरीबों में नहीं बाँटता?

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।

अर्थात : जब माता पिता अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित रखते हैं, तो वे उनके दुश्मन हैं। अनपढ़ व्यक्ति विद्वानों की बैठक में सम्मान नहीं पा सकता क्योंकि वह हंसो के बीच एक बगुले के समान है।

एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन:।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥

अर्थात : अकेले व्यक्ति पाप करता है, लेकिन बहुत से लोग उसका तत्काल लाभ उठाते हैं और खुश होते हैं। कर्ता पापकर्मों की सजा पाता है, लेकिन सुखभोगी पाप से छुटकारा पाता है।

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।

अर्थात : राजा और विद्वान की कभी तुलना नहीं की जा सकती। राजा केवल अपने राज्य में सम्मान पाते हैं, लेकिन विद्वान हर जगह सम्मान पाते हैं।

एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रम सराजकम् ॥

अर्थात : जब एक धनुर्धर बाण छोड़ता है, तो शायद वह किसी को मार डाले। लेकिन एक बुद्धिमान आदमी गलत फैसला ले, तो राजा सहित पूरे देश को बर्बाद कर सकता है।

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यं त्वं एव तनुषे चेत।
विश्वस्मिन अधुना अन्य:कुलव्रतम पालयिष्यति क:।।

अर्थात : प्रिय हंस, यदि तुम दूध और पानी में अंतर करना छोड़ दोगे तो इस जगत में तुम्हारा पालन कौन करेगा? निष्पक्ष व्यवहार कौन करेगा अगर बुद्धिमान व्यक्ति ही अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ देंगे?

एकमेवाद्वितीयम तद् यद् राजन्नावबुध्यसे।
सत्यम स्वर्गस्य सोपानम् पारवारस्य नैरिव ॥

अर्थात : यह समझने का प्रयास करें कि नौका में बैठकर ही समुद्र पार किया जा सकता है। इसी तरह सत्य की सीढ़ियाँ चढ़कर ही स्वर्ग द्धार तक पहुँचा जा सकता है।

(11) Shri Ganesh Shlok With Hindi Meaning

Shri Ganesh Shlok With Hindi Meaning

ऊँ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्यप्रदायिने।
दुष्टारिष्टविनाशाय पराय परमात्मने॥

अर्थात : राजा गणेश को सभी सुख देने वाले सच्चिदानंद के रूप में नमस्कार। गणपति, सर्वोच्च देवता, बुरे ग्रहों को दूर करने वाले हैं उन्हें मेरा प्रणाम।

लम्बोदराय वै तुभ्यं सर्वोदरगताय च।
अमायिने च मायाया आधाराय नमो नमः॥

अर्थात : तुम लम्बोदर हो, सबके पेट में जठर रूप में निवास करते हो। तुम पर किसी का भ्रम काम नहीं करता और तुम ही माया के आधार हो। श्री गणेश देवा आपको हर बार नमस्कार करता हु।

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः।।

अर्थात : हम गणेश जी को सदा प्रणाम करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से मोक्ष की इच्छा रखने वालों की अज्ञानी बुद्धि नष्ट हो जाती है, भक्तों को संतुष्टि का धन मिलता है, जो बाधाओं को दूर करता है और कार्य में सफलता मिलती है।

मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते।।

अर्थात : श्री गणेश आपका वाहन चूहा है, हाथों में मोदक (लड्डू), बड़े पंखों की तरह कान, और एक पवित्र धागा। मैं आपके चरणों में नतमस्तक हूँ, जो छोटा है और महादेव के पुत्र हैं, जो सभी बाधा दूर करेंगे।

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।।

अर्थात : समस्त विघ्नों को दूर करने के लिए श्वेत वस्त्रधारी श्री गणेश भगवान का ध्यान करना चाहिए। इनका रंग चन्द्रमा के समान है, जिनकी चार भुजाएँ हैं और हस्ते हुए सुखी हैं।

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च।।

अर्थात : मैं भगवान गजानन की पूजा करता हूँ, जो सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। वे सोने की चमक से चमकते हैं और सूर्य की तरह तेज हैं, एक सर्प की बलि का पर्दा पहनते हैं, सीधे, दांत वाले और कमल के आसन पर बैठे हैं।

एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं।
विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात : दिव्य प्रभु श्री गणेश जी को नमन करता हूं, जो एक दांत से सुशोभित हैं। साथ ही एक विशाल शरीर है, सीधा है, गजानन है और जो बाधाओं का नाश करने वाले है।

गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे।
अपारकरुणापूरतरङ्गितदृशे नमः।।

अर्थात : विघ्नों का नाश करने वाले, अन्धकार नाश करने वाले, अथाह करुणा के जल से दीप्तिमान नेत्रों वाले गणेश नाम के प्रकाशस्तंभ को नमस्कार है।

पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम्।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम्॥

अर्थात : मैं भक्तानन्दवर्धन मयूरेश गणेश को प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ। जो पार्वती जी को पुत्र रूप में सुख देते हैं और भगवान शंकर के आनन्द को भी बढ़ाते हैं।

गजाननाय पूर्णाय साङ्ख्यरूपमयाय ते।
विदेहेन च सर्वत्र संस्थिताय नमो नमः॥

अर्थात : हे गणेश! गज की तरह चेहरा वाले भगवान और ज्ञान का अवतार हो। मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ क्योंकि आप निराकार रूप में हर जगह उपस्थित हैं।

(12) Spiritual Sanskrit Shlok – बेहतरीन आध्यात्मिक श्लोक

Spiritual Sanskrit Shlok

रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव।।

अर्थात : प्रभु श्रीराम धर्म के मूर्त स्वरूप हैं, वे बड़े साधु व सत्यपराक्रमी हैं। जिस प्रकार इंद्रजी देवताओं के नायक है, उसी प्रकार भगवान श्रीराम हम सबके नायक है।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

अर्थात : मैं वासुदेवानंदन जगद्गुरु श्री कृष्ण को नमन करता हूं। जिन्होंने दुष्ट कंस और चानूर को मार डाला, देवकी का आशीर्वाद साथ।

अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम्, अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना:।
यत् सारभूतं तदुपासितव्यं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात्॥

अर्थात : हमारे देश में बहुत से शास्त्र, वेद और विद्या है, लेकिन समय बहुत कम है और ज्ञान अधिक है। ऐसे में हमें हमेशा सही चुनना चाहिए, जैसे हंस जल और दूध में से दूध पसंद करता है।

अतः सत्यं यतो धर्मो मतो हीरार्जवं यतः।
ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः।।

अर्थात : जहां सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता का वास है, वहां श्रीकृष्ण निवास करते हैं और जहां श्रीकृष्ण निवास करते हैं। वहां विजय का वास होता है।

स्वस्तिप्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥

अर्थात : शक्तिशाली नेता कानून और न्याय का पालन करेंगे तो सभी लोगों की भलाई होगी। सभी दिव्यांगों और बुद्धिमान लोगों की सफलता बनी रहे और दुनिया भर में खुशी बनी रहे।

पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः।
विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः।।

अर्थात : भगवान के लिए –  वे सर्वंतरीमी पुरुषोत्तम जनार्दन हैं, मानो वे खेल के माध्यम से पृथ्वी,आकाश और स्वर्गीय दुनिया को प्रेरित कर रहे हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

अर्थात : मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेता हूं जब भी धर्म की हानि होती है, या अधर्म बढ़ता है। धर्मानुसार व्यवहार करना चाहिए क्योंकि भगवान ऐसे लोगों को मार डालता है जो अधर्म करते हैं।

शैले शैले न माणिक्यं,मौक्तिम न गजे गजे।
साधवो नहि सर्वत्र,चंदन न वने वने।।

अर्थात : प्रत्येक पर्वत पर अनमोल रत्न नहीं होते, प्रत्येक हाथी के मस्तक में मोती नहीं होता। सज्जन लोग सब जगह नहीं होते और प्रत्येक वन में चंदन नही पाया जाता।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

अर्थात : बुद्धिमान लोग काव्यशास्त्र एंव साहित्य का अध्ययन करते हैं। जबकि मूर्ख लोग सोते हैं, झूठ बोलते हैं और बुरी आदतों में समय बिताते हैं।

सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥

अर्थात : जय या विजय सत्य का होता है, असत्य का नहीं। देवता और दैवी का मार्ग सत्य से फैला हुआ है। जिस मार्ग पर चलने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का श्रेष्ठ धाम है।

(13) Sanskrit Shlok On Vidya With Meaning

Sanskrit Shlok On Vidya With Meaning

अधिगतपरमार्थान्पण्डितान्मावमंस्था
स्तृणमिव लघुलक्ष्मीर्नैव तान्संरुणद्धि।
अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां
न भवति बिसतन्तुवरिणं वारणानाम्।।

अर्थात : उन बुद्धिमानों का तिरस्कार मत करो जिन्होंने सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति को कभी भी काम या अपमान के लिए नहीं आंका जाना चाहिए। क्योंकि संसार की भौतिक संपत्ति उसके लिए घास समान है। जिस प्रकार शराबी हाथी को कमल की पंखुड़ियों से नियंत्रित नहीं कर सकता, उसी प्रकार धन से बुद्धिमान नियंत्रित नहीं होता।

विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम्।।

अर्थात : ज्ञान और विनम्रता से संपन्न, वह किसी भी व्यक्ति के दिमाग को नहीं छीनता। जिनकी आंखें सोने और रत्नों के मेल से प्रसन्न होती हैं।

रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः।।

अर्थात : रूप में धनी, यौवनपूर्ण और भले ही एक विशाल परिवार में पैदा हुए हों, लेकिन शिक्षाहीन लोग सुगंधित कसौदा के फूल की तरह नहीं सुशोभित होते।

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्।।

अर्थात : एक क्षण भी गँवाए बिना ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और हर कण को बचाकर धन प्राप्त करना चाहिए। क्षण खो देने वाले को ज्ञान कहाँ है और कण को बुरा समझने वाले को धन कहाँ है?

विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु।।

अर्थात : विद्या अतुलनीय सर्वश्रेष्ठ है, भाग्य नष्ट होने पर आश्रय देती है। वह कामधेनु है, वियोग में समान है, तीसरी आंख है, आतिथ्य का मंदिर है, परिवार की महिमा है, बिना रत्नों के आभूषण है। इसलिए अन्य सब कुछ छोड़कर ज्ञान के अधिकारी बन जाओ।

हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना।।

अर्थात : जो चोरों को दिखाई नहीं देता, जो देने से विस्तारित होता है। जो प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होता है, ऐसा ज्ञान के अलावा और क्या हो सकता है?

मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते
कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम्।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम्
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या।।

अर्थात : विद्या धन माता के समान रक्षा करती है, पिता के समान लाभ दिलाती है। पत्नी के समान थकान दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है, सौन्दर्य को प्राप्त करती है और चारों दिशाओं में यश फैलाती है। वास्तव में यह विज्ञान कल्पवृक्ष के समान क्या सिद्ध नहीं करता?

अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।

अर्थात : यदि कोई व्यक्ति कई शंकाओं को दूर करता है, परोक्ष वस्तु को दिखाता है और नेत्रों के सभी शास्त्रों का अध्ययन नहीं करता है, तो वह आंख होने के बावजूद अंधा है।

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।।

अर्थात : जो लोग खुशी की तलाश में हैं उनके लिए ज्ञान कहां है? जो लोग ज्ञान की तलाश में हैं उनके लिए कोई खुशी नहीं है। जो सुख चाहता है उसे ज्ञान छोड़ देना चाहिए या जो ज्ञान चाहता है उसे सुख छोड़ देना चाहिए।

गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा।
अथवा विद्यया विद्या चतुर्थी नोपलभ्यते।।

अर्थात : यह ज्ञान सिर्फ एक गुरु की सेवा करके, बहुत पैसा देकर या सीखने के बदले में प्राप्त किया जा सकता है; ज्ञान का कोई चौथा उपाय नहीं है।

(14) Small And Easy Sanskrit Shlok

Small And Easy Sanskrit Shlok

एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम्,
सहैव दशभिः पुत्रैः भारं वहति रासभी॥

भावार्थ : एक अच्छा पुत्र होने से शेरनी वन में निडर होकर सोती है। परन्तु गधी दसियों पुत्रों के होने पर भी बोझा ढोती है।

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः,
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

भावार्थ : कार्य सही परिश्रम से ही पूर्ण होते हैं, मन में सोचने से नहीं। जैसे सोते हुए सिंह के मुख में हिरण खुद चल कर नहीं आता।

गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि,
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥

भावार्थ : चलती हई चींटी भी सैकड़ों योजन चली जाती है, जबकि न चलने वाला गरुड़ एक कदम भी नहीं चल पाता है।

सत्यं ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् ब्रूयात् सत्यमप्रियम्,
प्रियम् च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥

भावार्थ : सही धर्म है सत्य बोलना चाहिए और प्रिय बोलना चाहिये। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये और प्यारा झूठ भी नहीं।

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता,
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूज्येत्॥

भावार्थ : माता संपूर्ण तीर्थ स्वरुप है तथा पिता सब देवों के स्वरूप हैं। इसलिए माता और पिता की सम्मान देकर पूजा करनी चाहिए।

उदेति सविता ताम्रस्ताप एवास्तमेति च,
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥

भावार्थ : सूर्य लाल उदय होता है और लाल ही अस्त होता है। इसी तरह अच्छे और विपत्ति समय में महापुरुष एक समान रहते हैं।

मूढ़ैः प्रकल्पितं दैवं तत परास्ते क्षयं गताः।
प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः।।

भावार्थ : विश्व में भाग्य को सिर्फ मूर्ख लोग मानते हैं। बुद्धिमान लोगों को उनके पुरूषार्थ, कर्म और उद्द्यम से उत्तम स्थान मिलता है।

दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।
नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

भावार्थ : दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव अच्छे लोगो का कार्य बिगाड़ने का होता है। जैसे वस्त्रों को काटने वाला चूहा पेट भरने के लिए कपड़े नहीं कटता।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

भावार्थ : गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं, गुरू ही शंकर है, गुरू ही साक्षात परमब्रह्म हैं। ऐसे गुरू का मैं हर बार नमन करता हूं।

अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात्।
तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित्।।

भावार्थ : आग द्वारा सींचे गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते। वैसे ही सत्य के बिना धर्म की स्थापना करना असंभव है।

अबन्धुर्बन्धुतामेति नैकट्याभ्यासयोगतः।
यात्यनभ्यासतो दूरात्स्नेहो बन्धुषु तानवम्।।

भावार्थ : अपरिचित बार-बार मिलने से दोस्त बन जाते हैं। जबकि दूर रहने से दोस्तों का स्नेह भी कम हो जाता है।

(15) Hanuman Shlok In Sanskrit With Hindi

Hanuman Shlok In Sanskrit With Hindi

प्रभु चरित्र सुनिबे कै लागि मन माहिं।
पवनसुत नामु तिहुँ लोक पग ध्यान॥

भावार्थ : हनुमान जी के चरित्र को सुनने से मन में आनंद आता है। वे पवनपुत्र हैं जिनका सारे लोकों में ध्यान किया जाता है।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहिं।
जलधि लांघि गयउ अचरज नाहिं॥

भावार्थ : श्रीराम जी की मुद्रिका को पाकर हनुमान जी के मुख पर आनंद था। बड़ा समुद्र पार करना उनके लिए आश्चर्यजनक नहीं था।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

भावार्थ : मन की गति वायु के समान तीव्र है, इन्द्रियाँ जीत ली जाती हैं और बुद्धिमान श्रेष्ठ होते हैं। मैं पवनपुत्र, वानरों के सरदार, श्री राम के दूत की शरण लेता हूँ।

मन क्रम बच क्रम जो चाहै।
होइ सके सो आपै आपै॥

भावार्थ : जो मन से, वचन से और कर्म से चाहता है, वह सब हनुमान जी की कृपा से सिद्ध हो जाता है।

चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

भावार्थ : प्रभु श्री हनुमान! चारों युगों में आपका पराक्रम विख्यात है, आपने संसार को प्रकाशित किया है।

लाल देह लालीलसे, अरुधरिलाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलण, जय जय जय कपिसूर।।

भावार्थ : हम लाल रंग वाले से प्रार्थना करते हैं, जिन पर लाल सिंदूर भी है। हम एक लाल लंगोटी में लिपटे प्रार्थना करते हैं। हम उससे प्रार्थना करते हैं की जिसका शरीर वज्र (भगवान इंद्र का हथियार) की तरह मजबूत है। हम राक्षसों के विनाशक बजरंग बलि से अरज करते हैं। हम हनुमान को देवताओं में सर्वोच्च भगवान मानते हैं।

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।

भावार्थ : मैं श्री गुरु महाराज के चरणकमलों की धूल से अपने मन के दर्पण को शुद्ध करके श्री रघुवीर की शुद्ध महिमा का वर्णन करता हूँ। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार फलों के दाता हैं।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुरभूप।।

भावार्थ : हे संकटमोचक पवन कुमार हनुमान! आप एक आनंदित ऊर्जा हैं। ओह प्रभु! आप श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में भी निवास करते हैं।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।

भावार्थ : प्रिय पवन कुमार, मैं तुम्हें नमन करता हूँ। जैसा कि आप जानते हैं, मेरी बुद्धि और शरीर दोनों कमजोर हैं। मेरे दुखों, दोषों को दूर करो तथा मुझे शारीरिक बल, बुद्धि और ज्ञान दो।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।
ॐ हं हनुमते नमः।।

भावार्थ : हनुमान जी को प्रणाम! अद्भुत शक्ति का निवास, जिसका शरीर सोने के पहाड़ों की तरह चमकता है। जो राक्षसों की वन अग्नि है, जो बुद्धिमानों का प्रमुख है, जो भगवान राम के प्रिय भक्त हैं, मैं हनुमान नामक देवता की पूजा करता हूँ। देवता पवन का पुत्र वह नवोदित व्याकरणज्ञ है, उनका शरीर सोने के पहाड़ों की तरह चमकदार है।

(16) Sanskrit Shlok For Instagram Bio

Sanskrit Shlok For Instagram Bio

  • मनुष्यत्वम् धर्ममधिकम् – मानवता सबसे बड़ा धर्म है।
  • सत्यमेव जयते – केवल सत्य ही जीतता है।
  • यद्भावम् तद्भवति – जैसा भाव वैसी भावना।
  • आत्मा विश्वस्य केन्द्रम् – आत्मा ही संसार का केंद्र है।
  • एकमेवाद्वितीयम् ब्रह्म – ब्रह्म एकमात्र और अद्वितीय है।
  • स्वस्मिन्नेव वसतु सर्वम् – सब कुछ तो अपने अंदर ही विद्यमान है।
  • आत्मा खलु कमर्णाम् – आत्मा ही कर्मों का कर्ता।
  • आराधय सर्वभूतानि – सभी प्राणियों की सेवा करो।
  • वसुधैव कुटुम्बकम् – सारा संसार ही एक परिवार है।
  • परोपकाराय फलन्ति वृक्षा – दूसरों की सहायता करने वाले वृक्ष फलते हैं।
  • ज्ञानं परमं धनम् – ज्ञान सबसे बड़ा धन है।
  • ज्ञानं प्राण प्रतिष्ठा – ज्ञान ही प्राणों का आधार है।
  • उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान् – उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त करो।
  • असतो मा सद्गमय – असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
  • धर्म कीमकार्येषु काल – धर्म के काम में देरी नहीं करना चाहिए।
  • मनने चिन्तने च ज्ञानमुद्भवति नान्यथा – मनन और चिंतन से ही ज्ञान प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।

(17) गुरु के लिए श्लोक – Guru Purnima Shlok

Guru Purnima Shlok

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

भावार्थ : गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु भगवान है, गुरु महेश्वर है। शिक्षक साक्षात् परम ब्रह्म है, मैं उस श्री गुरु को प्रणाम करता हूँ।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

भावार्थ : उस महान गुरु को अभिवादन, जिसने सभी जीवित और मृत में व्याप्त उस अवस्था को देखना संभव किया।

विनयफलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुतं ज्ञानम्।
ज्ञानस्य फलं विरतिः विरतिफलं चाश्रवनिरोधः।।

भावार्थ : विनय का फल सेवा है, गुरु सेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है। इसी क्रम में विरक्ति का फल आश्रवनिरोध (बंधनमुक्ति तथा मोक्ष) है।

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।
तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते।।

भावार्थ : धर्म को जानने वाले, धर्म मुताबिक आचरण करने वाले, धर्मपरायण और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करने वाले गुरु हैं।

नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत्।।

भावार्थ : हमेशा अपने गुरु का विशेष रूप से आदर करना चाहिए। जैसे गुरु के सामने उनसे छोटे आसन पर बैठना चाहिए। गुरु के सामने हमेशा शिष्टपूर्ण व्ययवहार करना चाहिए।

गुरौ न प्राप्यते यत्तन्नान्यत्रापि हि लभ्यते।
गुरुप्रसादात सर्वं तु प्राप्नोत्येव न संशयः।।

भावार्थ : जो गुरु में नहीं मिलता वह कहीं और नहीं मिलता। परन्तु गुरु की कृपा से निःसंदेह सब कुछ प्राप्त हो जाता है।

विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम्।
शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता।।

भावार्थ : ज्ञानवान, निपुणता, विनम्रता, पुण्यात्मा, मनन चिंतन, सर्व सचेत और प्रसन्न रहना ये सात शिक्षक के मुख्य गुण है।

निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते।।

भावार्थ : वह दूसरों को लापरवाही से दूर करता है और खुद अच्छी राह पर चलता है। जो सत्य को योग्य बनाता है, जो भक्तों का कल्याण चाहता है और मंगल की कामना करता है, वह आध्यात्मिक गुरु कहलाता है।

दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम्।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन।।

भावार्थ : जैसे दूध के बिना गाय, फूल के बिना लता, चरित्र के बिना पत्नी, कमल के बिना जल। शांति के बिना विद्या, और लोगों के बिना नगर शोभा नहीं देते, वैसे हि गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देते।

एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत्।
पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत्।।

भावार्थ : गुरु शिष्य को जो एक अक्षर भी कहे, तो उसके बदले में पृथ्वी का ऐसा कोई धन नहीं, जो देकर गुरु के ऋण से मुक्त हो पाए।

(18) संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित – Shlokas In Hindi

Shlokas In Hindi Sanskrit

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

भावार्थ : लोगों की निंदा किये बिना दुष्ट व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है, परंतु बिना गंदगी उसकी तृप्ति पूरी नहीं होती।

दुर्जन:परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन।
मणिना भूषितो सर्प:किमसौ न भयंकर:।।

भावार्थ : यदि दुष्ट व्यक्ति विद्या से सुशोभित हो तो वह विद्यावान होने के बावजूद परित्याग कर देगा। जैसे मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता?

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्।
दंपत्यो कलहं नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागतः।।

भावार्थ : जहाँ मूर्ख को सम्मान नहीं मिलता हो, जहाँ अनाज अच्छे तरीके से रखा जाता हो। जहाँ पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होती हो, वहाँ लक्ष्मी स्वयं आती है।

निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते।।

भावार्थ : वह बुद्धिमान है जो अपनी कोशिशों पर दृढ़ प्रतिबद्धता से शुरू करता है, काम पूरा होने तक ज्यादा आराम नहीं करता, समय बर्बाद नहीं करता और अपने विचारों पर नियंत्रण रखता है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

भावार्थ : विनम्र और नित्य अनुभवियों की सेवा करने वाले में आयु, विद्या, यश और बल नामक चार गुणों का विकास होता है।

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि।
एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते।।

भावार्थ : बिना दया के किये गये काम में कोई फल नहीं मिलता, ऐसे काम में धर्म नहीं होता जहां दया नहीं होती। वहां वेद भी अवेद समान बन कर रह जाता हैं।

यावद्वित्तोपार्जनसक्त तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥

भावार्थ : जब तक व्यक्ति पैसे कमाने में सक्षम है, तब तक उसे परिवार के सभी लोग प्यार करते हैं। लेकिन जब व्यक्ति अशक्त हो जाता है, तो उसे आम बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है।

यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता।
मज्जन्ति तेवशा राजन् नद्यामश्मप्लवा इव।।

भावार्थ : जहां का शासन स्त्री, जुआरी और बालक के हाथ में होता है। वहां के लोग नदी में पत्थर की नाव में बैठने वालों की भांति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूबते हैं।

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढ़चेता नराधमः॥

भावार्थ : मनुष्यों में सबसे अधम, यानी नीच व्यक्ति वह है जो बिना बुलाए किसी से मिलता है। बिना पूछे अधिक बोलता है और किसी पर विश्वास नहीं करता है। उसे मूढ़, चेता और अधम व्यक्ति कहा जाता है।

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥

भावार्थ : उत्साह श्रेष्ठ पुरुषों की शक्ति बल है, उत्साह से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। इस दुनिया में उत्साहित व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

(19) सत्य पर श्लोक – Satya Slokas In Hindi

Satya Slokas In Hindi

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

भावार्थ : सत्य से पृथ्वी कायम है और सत्य से ही सूर्य चमकता है। सत्य से हवाएँ चलती हैं और सब कुछ सत्य में स्थापित हो जाता है।

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याऽभ्यासेन रक्ष्यते ।
मृज्यया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥

भावार्थ : धर्म का रक्षण सत्य से, विद्या का अभ्यास से, रुप का सफाई से और कुल का रक्षण आचरण द्वारा सफल होता है ।

सत्यमेव व्रतं यस्य दया दीनेषु सर्वदा ।
कामक्रोधौ वशे यस्य स साधुः – कथ्यते बुधैः ॥

भावार्थ : वह जिसका व्रत गरीबों के प्रति उसकी करुणा के प्रति सदैव सच्चा है। ज्ञानीजन काम और क्रोध पर नियंत्रण रखने वाले को ही संत कहते हैं।

ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ।
प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

भावार्थ : जो लोग इस संसार में सत्य बोलते हैं, तब भी जब वे अपने प्राण त्यागने वाले होते हैं। वे सभी जीवों के प्राधिकारी हैं और सभी कठिनाइयों से परे हैं।

सत्यहीना वृथा पूजा सत्यहीनो वृथा जपः ।
सत्यहीनं तपो व्यर्थमूषरे वपनं यथा ॥

भावार्थ : सत्य के बिना पूजा व्यर्थ है और सत्य के बिना जप व्यर्थ है। सत्य के बिना तप व्यर्थ है, जैसे हंसिया पर हजामत बनाना व्यर्थ है।

भूमिः कीर्तिः यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि ।
सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः ॥

भावार्थ : भूमि, कीर्ति, यश और लक्ष्मी, सत्य का अनुसरण करने वाले पुरुष की प्रार्थना करते हैं। इसलिए हमेशा सत्य को हि भजना और पूजना चाहिए।

सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावरस्य नौरिव ।
न पावनतमं किञ्चित् सत्यादभ्यधिकं क्वचित् ॥

भावार्थ : सत्य स्वर्ग की तरफ एक सीढ़ी है, जैसे एक नाव समुद्र की ओर। सत्य से अधिक पवित्र अन्य कुछ भी नहीं है।

सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात् सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥

भावार्थ : सत्य से साक्षी शुद्ध होता है और सत्य से धर्म बढ़ता है। इसलिए सभी जातियों के गवाहों को सच बोलना चाहिए।

वयसि गते कः कामविकारः,शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः,ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥

भावार्थ : बुढ़ापे में काम विकार क्या है, सूखे पानी में खांसी क्या है। जब धन नष्ट हो गया, तो परिवार क्या रहा, और जब सत्य जान लिया गया, तो संसार क्या रहा?

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः,शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥

भावार्थ : दिन-रात, शाम-सुबह, सर्दी-बसंत निरंतर आते-जाते हैं इस काल खेल में जीवन नष्ट होता रहता है, लेकिन इच्छा कभी नहीं मरती।

(20) प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक – Inspirational Shlok

Inspirational Shlok

उद्योगिनं पुरुषसिंहं उपैति लक्ष्मीः
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदंति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषं आत्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति न कोऽत्र दोषः।

भावार्थ : लक्ष्मी मेहनती सिंह पुरुष के पास आती हैं, कायर लोग कहते हैं कि भाग्य पर सब है। भाग्य को मार डालो और अपने बल से पुरुषत्व करो, यदि प्रयास करने के बाद भी यह काम नहीं करता, तो इसमें कुछ गलत नहीं है।

न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥

भावार्थ : कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है, इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान व्यक्ति है।

अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते।
छेत्तुः पार्श्वगताच्छायां नोपसंहरते द्रुमः॥

भावार्थ : यदि शत्रु भी अपने घर पर आ जाए तो उसका उचित आतिथ्य सत्कार करना चाहिए। जैसे वृक्ष अपने काटने वाले से भी अपनी छाया को कभी नहीं हटाता है।

उपदेशोहि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम्॥

भावार्थ : मूर्खों को सलाह देने पर, उन्हें गुस्सा आता है यह उन्हें शांत नहीं करता है। जिस प्रकार सांप को दूध पिलाने पर उसका जहर बढ़ता जाता है।

आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥

भावार्थ : इन्सान और पशु में आहार, निद्रा, भय और मैथुन समान है। इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है।

पश्य कर्म वशात्प्राप्तं भोज्यकालेऽपि भोजनम् ।
हस्तोद्यम विना वक्त्रं प्रविशेत न कथंचन ।।

भावार्थ : भोजन थाली में परोस कर सामने रखा हो पर जब तक उसे उठा कर मुंह में नहीं डालोगे, वह खुद अपने आप मुंह में तो चला नहीं जाएगा।

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥

भावार्थ : सिंह को जंगल का राजा नियुक्त करने के लिए न तो कोई अभिषेक किया जाता है, न कोई संस्कार। अपने गुण और पराक्रम के कारण वह खुद ही श्रेष्ठ पद प्राप्त करता है।

मानात् वा यदि वा लोभात् क्रोधात् वा यदि वा भयात्।
यो न्यायं अन्यथा ब्रूते स याति नरकं नरः।

भावार्थ : कहा जाता है कि यदि कोई अहंकार के कारण, लोभ से, क्रोध से या डर से गलत फैसला लेता है तो उसे नरक जाना पड़ता है।

निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा।
विषं भवतु मा वास्तु फटाटोपो भयंकरः।

भावार्थ : सांप जहरीला न हो पर फुफकारता और फन उठाता रहे तो लोग डर कर भाग जाते हैं। वह इतना भी न करे तो लोग उसकी रीढ़ को जूतों से कुचल कर तोड़ दें।

सुसूक्ष्मेणापि रंध्रेण प्रविश्याभ्यंतरं रिपु:
नाशयेत् च शनै: पश्चात् प्लवं सलिलपूरवत्

भावार्थ : नाव में पानी एक छोटे से छेद से भीतर आने लगता है और उसे भर कर डूबा देता है। इसी प्रकार अगर शत्रु को कोई छोटा रास्ता या भेद मिलता है, तो वह उसे बर्बाद कर देता है।

(21) Sanskrit Shlok On Karma – कर्म पर श्लोक

Sanskrit Shlok On Karma

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, तुम्हारे पास सिर्फ कार्य करने का अधिकार है। आप अपने कर्मों के फल का अधिकार नहीं रखते। यही कारण है कि आप सिर्फ अपने काम पर ध्यान दें, न कि इसके परिणामों की चिंता करें।

अचोद्यमानानि यथा, पुष्पाणि फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते, तथा कर्म पुरा कृतम्।

भावार्थ : जिस प्रकार फल बिना किसी प्रेरणा के समय पर उग जाते हैं, उसी तरह पहले किये हुए कर्म भी यथासमय ही अपने फल देते हैं। यानिकी कर्मों का फल अवश्य रूप से मिलता ही है।

ज्ञेय: स नित्यसंन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||

भावार्थ : उस व्यक्ति को निरंतर संन्यासी कहा जाता है जो न तो कर्मफलों से घृणा करता है और न ही उनकी इच्छा करता है। हे महाबाहु अर्जुन, मनुष्य सभी दुःखों से छुटकारा पाकर ब्रह्मबंधन को पार कर पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाता है।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य: |
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||

भावार्थ : यदि कोई व्यक्ति अपने कर्मफलों को परमेश्वर को समर्पित करके स्वतंत्र रूप से अपना काम करता है, तो वह पापकर्मों से उसी तरह अछूता रहता है जैसे कमलपत्र जल से अछूता रहता है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

भावार्थ : क्षण भर भी कोई व्यक्ति कर्म किए बिना जीवित नहीं रह सकता। प्रकृति सभी जीवों को नियंत्रित करती है, और वह हर जीव को अपने अनुकूल व्यवहार करवाती है और इसके परिणाम भी देती है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।

भावार्थ : तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

यत् कृतं स्याच्छुभं कर्मं पापं वा यदि वाश्नुते।
तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्भिः।।

भावार्थ : अपने जीवन में मनुष्य जो भी अच्छे-बुरे कर्म करता है, उनका फल उसे भोगना पड़ता है। इसीलिए मन, बुद्धि और शरीर से सदा अच्छे कर्म करने चाहिए।

शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम्।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम्।।

भावार्थ : पंचमहाभूत लोगों को उनके अच्छे और बुरे कामों का साक्षी बनाते हैं, जो मरने पर उनके कर्मों का फल देते हैं। ज्यादा अच्छे और बुरे कर्मों का फल पहले मिलता है।

न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा ।
मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृत दुष्कृतैः।।

भावार्थ : पिता की क्रिया कर्म का पुत्र की क्रियाओं से कोई संबंध नहीं है। जीव अपने पाप और पुण्य कर्मों के बंधन में बंधे हुए हैं और उनके अनुसार चलते हैं।

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम्।।

भावार्थ : जैसे उचित समय पर फूल और फल वृक्षों पर लगने के लिए कोई प्रेरणा नहीं चाहिए। वैसे ही पूर्व जन्म के कर्म भी अपना फल देने का समय नहीं बदलते। उसे उचित समय पर फल मिलता है।

(22) Sanskrit Shlok On Life – जीवन पर श्लोक

Sanskrit Shlok On Life

ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे।
रज्जवेव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति॥

भावार्थ : अत्यधिक ऐश्वर्यवान और बुरे व्यसनों में लिप्त लोग रस्सियों से बंधे हुए लोगों की तरह होते हैं। और भाग्य अंततः उनको प्रताड़ित कर बहुत कष्ट देता है।

कण्ठे मदः कोद्रवजः हृदि ताम्बूलजो मदः।
लक्ष्मी मदस्तु सर्वाङ्गे पुत्रदारा मुखेष्वपि॥

भावार्थ : पान खाने और शराब पीने से बोलने की क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। किंतु बहुत धनवान होने का नशा व्यक्तियों के चेहरों पर भी दिखाई देता है, खासकर उनकी स्त्रियों और संतान के चेहरों पर।

कण्टकावरणं यादृक्फलितस्य फलाप्तये।
तादृक्दुर्जनसङ्गोपि साधुसङ्गाय बाधनं॥

भावार्थ : जिस प्रकार एक वृक्ष के कांटे उसके फलों को प्राप्त करने में बाधा डालते हैं। वैसे ही दुष्ट लोगों की मित्रता भी अच्छे और सही लोगों की संगति में बाधा डालती है।

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

भावार्थ : जिनमें न ज्ञान है, न तप है, न दान है, न विद्या है, न गुण है और न धर्म है। वो नश्वर संसार में पृथ्वी के बोझ हैं और मानव रूप में पशु की तरह घूमते हैं।

वागुच्चारोत्सवं मात्रं तत्क्रियां कर्तुमक्षमाः ।
कलौ वेदान्तिनो फाल्गुने बालका इव ॥

भावार्थ : लोग वाणी बोलने का आनंद उठाते हैं, पर उस अनुसार क्रिया करने में समर्थ नहीं होते। कलियुग के वेदांती, फाल्गुन मास के बच्चों जैसे लगते हैं।

कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहृदं।
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणां॥

भावार्थ : आपसी कलह और वैमनस्य से बड़े-बड़े राजप्रासाद नष्ट हो जाते हैं, और कटु शब्द कहने से दोस्ती समाप्त हो जाती है। यदि राजा अयोग्य और दुष्ट है, तो देश नष्ट हो जाएगा, बुरे कर्म से मान सम्मान नष्ट हो जाएगा।

कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि।
अकर्तव्यं न कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि॥

भावार्थ : जो भी हमारा कर्तव्य है उसका पालन हमें मृत्यु संकट उपस्थित होने की स्थिति में भी करना चाहिये। और जो निषिद्ध कार्य हैं उन्हें भी मृत्यु संकट उपस्थित होने पर नहीं करना चाहिये |

करारिव शरीरस्य नेत्रयोरिव पक्ष्मणी।
अविचार्य प्रियं कुर्यात्तन्मित्रं मित्रमुच्यते॥

भावार्थ : शरीर के हाथों तथा आंखों की पलकों के समान जो व्यक्ति बिना विचार किये हुए तुम्हारी सहायता करता है। वही एक सच्चा मित्र कहलाता है।

असतां सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधन प्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः॥

भावार्थ : महान और सज्जन लोगों की गरिमा को भी झूठे और नीच लोगों के संपर्क में रहने से बहुत अधिक नुकसान होता है। देखो न, दुष्ट युवराज दुर्योधन के साथ रहने के कारण उसके आदरणीय पितामह भीष्म को भी अपयश का शिकार होना पड़ा और गायों को बलपूर्वक छीनना पड़ा।

काष्टाद्यथाग्निरुत्पन्न: स्वाश्रयं दहति क्षणात्।
क्रोधाग्निर्देहजस्तद्वत्तमेव दहति ध्रुवं॥

भावार्थ : जैसे लकड़ी के टुकडों को आपस में जोर से रगडने से उनमें अग्नि उत्पन्न होती है और वे जल उठते हैं। वैसे ही मनुष्य के शरीर में भी क्रोध की अग्नि छुपी होती है। जो किसी विवाद या झगड़े में निश्चित रूप से सुलगकर उसे जला देती है।

(23) Birthday Wish In Sanskrit With Meaning

Birthday Wish In Sanskrit With Meaning

दीघयियरोग्ययस्तु। सुयशः भवतु।
विजयः भवतु। जन्मदिनशुभेच्छा:।।

भावार्थ : इस विशेष जीवन में आप दीर्घायु और आरोग्य रहें। जीवन में यश प्राप्त करें, जीवन में जीत हाँसिल करें। आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

त्वं जीव शतं वर्धमान:।
जीवनस्य सकलकामनासिद्धिरस्तु।
जन्मदिनमिदम् अयि प्रिय सखे।
शं तनोतु ते सर्वदा मुदम्।।

भावार्थ : तुम सौ साल जिओ और जीवन में सब कुछ पाओ, प्यारे दोस्त, यह जन्मदिन आपके लिए हमेशा मंगल और खुशी लेकर आता रहे।

स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु।
विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु।
सुदिनम् सुदिना जन्मदिनं तव।।

भावार्थ : आप हमेशा हर्षित, कुशल और लंबे जीवन अर्थात लम्बी आयू को प्राप्त करें। आपको जन्मदिन पर एक शानदार दिन की बहुत शुभकामनाएं।

जीवेत् शरदः शतम्।
स्वस्त्यस्तु ते कुशलमस्तु चिरायुरस्तु,
उत्साह- शौर्य धन- धान्य।
अवतरणदिवसस्य हार्दिक्यः शुभकामनाः।

भावार्थ : आप एक शताब्दी तक जीयेंगे, आपको बहुत शुभकामना। आप सुरक्षित रहें और जीवित रहें, आप साहस, शौर्य, धन, धान्य आदि से समृद्ध ऐश्वर्यवान् और बलवान् होंगे। इस खास जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।

सूर्य संवेदना पुष्पे, दीप्ति कारुण्यगंधने।
लब्ध्वा शुभं जन्मदिवसेऽस्मिन कुर्यात्सर्वस्य मंगलम्‌।।

भावार्थ : जैसे सूर्य प्रकाश देता है, संवेदना करुणा पैदा करती है, पुष्प हमेशा महके रहते हैं, उसी तरह यह जन्मदिवस आपके लिए हर दिन, हर क्षण मंगलमय हो। जन्मदिन की लाख बार हार्दिक बधाई देते है।

चिरंजीव कुरु कीर्तिवर्धनम्। चिरंजीव कुरु पुण्यावर्धनम्।
जन्मदिनमिदम् अयि प्रिय सखे। शं तनोतु ते सर्वदा मुदम्।।

भावार्थ : हम चाहते है आप लंबे समय के लिए प्रसिद्धि की तरफ जाये और आप लंबे समय तक अपने अच्छे कर्मों के साथ रहें। यह जन्मदिन आपके लिए अपार खुशियां लेकर आए।

तव जन्मदिने यान्तु सुखसम्पत्ति सैनिकाः
विघ्नशत्रून् च नश्यन्तु बलो विद्या च वर्ध्दतु ।
जन्मदिवसस्य अभिनन्दनानी ||

भावार्थ : हमारी दुआ है की जन्मदिन में तुम्हें सुख संपत्ति मिले, तुम्हारे शत्रुओं का नाश हो। साथ ही तुम्हारे यश, बल और बुद्धि की वृद्धि होती रहे। जन्मदिन की खूब बधाईयाँ!

त्वं जीव शतं वर्धमान:।
जीवनम्‌ तव भवतु सार्थकं
इति सर्वदा मुदम्‌ प्रार्थयामहे।।
जन्मदिवसस्य अभिनन्दनानि।।

भावार्थ : मेरे प्रिय मित्र तुम सौ वर्ष जिओ, आपका जीवन सबके लिए कल्याणकारी हो। हम सभी आपके लिए यही प्रार्थना करते है, जन्मदिन की बधाईयाँ।

प्रार्थयामहे भव शतायुषी।
इश्वरः सदा त्वां च रक्षतु।।

भावार्थ : हम सभी आपके लंबे जीवन के लिए मनोकामना करते हैं। भगवान हमेशा आपकी रक्षा करें और सुख दे।

आपृच्छस्व पुराणम् आमन्त्रयस्व
च नवम् आशा-सुस्वप्न-जिगीषाभिः।
जन्मदिनशुभेच्छा:।।

भावार्थ : मेरे दोस्त पुराने को अलविदा कहो और नए की आशा करो। सपने और महत्वाकांक्षा से भरे नए को गले लगाओ। आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

(24) आदित्य हृदय स्तोत्र के संस्कृत श्लोक

Aditya Hridaya Stotra Shlok

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥

भावार्थ : सबके दिलों में रमन करने वाले भगवान राम, इस अनूठी पवित्र स्तोत्र को सुनो। इसका जप करने से तुम युद्ध में अपने सभी शत्रुओं को हराओगे।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥

भावार्थ : इस विशिष्ट स्तोत्र का नाम है “आदित्यहृदय”। यह सबसे पवित्र और पूरे शत्रुओं को मार डाले ऐसा है। इसके जप से सदा जीत मिलती है। यह स्तोत्र हर समय रहता है, परम कल्याणकारी है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥

भावार्थ : इसमें सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है, इससे सभी पापों का नाश हो जाता है। यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥

भावार्थ : सूर्य देव अपने अनंत प्रकाश से सुशोभित हैं। ये सदा उदय होते हैं, देवताओं और असुरों से नमस्कार प्राप्त करते हैं। विवस्वान नाम से प्रसिद्ध हैं, प्रकाश फैलाते हैं और दुनिया के मालिक हैं। तुम इनका पूजन रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः और भुवनेश्वराये नमः करो।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥

भावार्थ : संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं, ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥

भावार्थ : यही देवता ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं।

नक्षत्रग्रहताराणा-मधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तुते॥

भावार्थ : नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, जगत की रक्षा करने वाले और द्वादशात्मा हैं, जो तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाए नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥

भावार्थ : आप जीत, सफलता और कल्याण के दाता हैं। हरे रंग के घोड़े आपके रथ में जुते रहते हैं। आपको बार-बार धन्यवाद, सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको कही बार प्रणाम करते है।

ब्रह्मेशानाच्युतेषाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥

भावार्थ : सूर्य देव आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं। सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषाम् पतये नमः॥

भावार्थ : आप अज्ञानता और अन्धकार को मार डालने वाले हैं, जड़ता और शीत को दूर करने वाले हैं और शत्रु को मार डालने वाले हैं। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले देवस्वरूप, आपको नमस्कार है।

(25) Short And Meaningful Sanskrit Shlok

  • सत्कार्यमेव जयते – केवल सत्कर्म ही जीतते हैं।
  • आगमार्थं च पूजनम् – आगमन का सत्कार करना चाहिए।
  • आचार्यादेव परं न विद्यते – गुरु से बढ़कर कोई नहीं।
  • मननं परमं औषधम् – मनन सर्वश्रेष्ठ औषध है।
  • आरोग्ये च धनं सर्वम् – स्वास्थ्य ही सब कुछ है।
  • तपः परं बलम् तप – सबसे बड़ा बल है।
  • कर्मण्येवाधिकारस्ते – कर्म ही तुम्हारा अधिकार है।
  • प्रत्यक्षज्ञानमेवास्ति – केवल प्रत्यक्ष ज्ञान ही सत्य है।
  • शुभारम्भः शोभते – शुभ आरंभ शोभा बढ़ाता है।
  • एकचित्तं सर्वभूतेषु – सबमें एक समान भाव रखो।
  • चित्तं निर्मलं कुरु – मन को निर्मल बनाओ।
  • आचार्यात् पादमादत्ते – गुरु के चरणों में प्रणाम करो।
  • आत्मा खलु कमर्णाम् – आत्मा ही कर्मों का कर्ता है।
  • मौनमेकं सर्वार्थसाधनम् – मौन ही सारे साधनों में श्रेष्ठ है।
  • आरोग्यं महत् लाभ – स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा लाभ है।

बेहतरीन संस्कृत श्लोक का वीडियो

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भारतीय संस्कृति में संस्कृत श्लोको का महत्त्व

भारतीय संस्कृति का मूल संस्कृत श्लोको में छिपा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने श्लोकों में जीवन के मूल तत्वों और सिद्धांतों को परिभाषित किया है। संस्कृत के श्लोक साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध हैं और भाषा की माधुर्य तथा परिष्कृतता को दिखाते हैं।

संस्कृत श्लोकों में जीवन के मूल मंत्र हैं, जो हमें आध्यात्मिक और नैतिक रूप से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। वे हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं और हमारी विशिष्ट पहचान का भी। श्लोक माध्यम से हम अपने जीवन-मूल्यों, धर्म और दर्शन से जुड़े रह सकते हैं।

संस्कृत श्लोक हमें जीवन में व्यर्थ चिंताओं और तनाव से छुटकारा दिलाते हैं। साथ ही हमें शांति और संतोष का मार्ग दिखाते हैं। उनमें प्रकृति, परमात्मा और मनुष्य के सच्चे संबंधों की व्याख्या की गई है। वे हमें परोपकार, सदाचार और ईमानदारी का रास्ता दिखाते हैं।

कुल मिलाकर, संस्कृत श्लोक हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के जीवंत उदाहरण हैं। उनमें प्राचीन भारतीय ज्ञान और तत्वज्ञान विशेष है। जो आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हैं। इसलिए हमें अपनी संस्कृति के इन खजानों को बचाने और विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए।

सवाल जवाब (FAQ)

यहाँ Sanskrit Shlokas से सम्बंधित महत्वपूर्ण सवालो के जवाब दर्शाये है।

(1) संस्कृत श्लोक क्या होते हैं?

संस्कृत श्लोक छोटे पद्यात्मक वाक्य होते हैं, जिनमें कोई सारभूत बात कही जाती है। ये आमतौर पर 2-4 पंक्तियों में समाप्त हो जाने वाले कथन होते हैं।

(2) संस्कृत श्लोकों का महत्व क्या है?

श्लोक हमारी प्राचीन साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इनमें जीवन के मूल तत्वों और दर्शन की गहरी समझ व्यक्त की गई है। ये हमें नैतिक और आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

(3) संस्कृत श्लोक कहाँ से लिए हैं?

श्लोको को प्राचीन ग्रंथ जैसे वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य आदि से लिए जाते हैं। इनके अलावा कई कवियों और विद्वानों द्वारा रचित श्लोक भी उपलब्ध हैं।

(4) श्लोक किस प्रकार सीखे जा सकते हैं?

संस्कृत श्लोक सीखने के लिए उनका अर्थ समझना ज़रूरी है। ध्यान से पढ़कर और अनुवाद करके उनका अभ्यास किया जा सकता है। सिखने में शिक्षक या विद्वान की मदद भी ली जा सकती है।

(5) श्लोक किन विषयों पर आधारित होते हैं?

अधिकांश श्लोकों में जीवन के लगभग सभी पहलुओं जैसे धर्म, नीति, सत्य, शांति, प्रेम, ज्ञान आदि पर विचार व्यक्त किए जाते हैं। कुछ श्लोक किसी कथा या घटना से संबंधित भी होते हैं।

आशा करता हु संस्कृत श्लोको का अच्छा संग्रह तैयार करने में सफल रहा हु। इस विशेष संग्रह पोस्ट को अपने सभी दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे।

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